UjjainMP

देवगुरू बृहस्पति मंदिर

उज्जैन का अतिप्राचीन देवगुरू बृहस्पति मंदिर देवगुरू बृहस्पति मंदिर उज्जैन के प्राचीन मंदिरों में से एक है यह मंदिर नगर के मध्य गोलामंडी (सराफा क्षेत्र) में स्थित है। देवगुरू बृहस्पति मंदिर भारत का एकमात्र ऐसा मंदिर है। जहां देवगुरू बृहस्पति की आद्य वेदानुरूप स्वयं-भम प्रतिमा स्थापित है।

यह प्रतिमा लगभग 5000 वर्ष पुरानी है। देवगुरू बृहस्पति की आद्य प्रतिमा जिस रूप में मंदिर में विराजमान है। उसी रूप का वर्णन वेदों एवं पुराणों में अंकित है जिनके अनुसार देवगुरू बृहस्पति के लंबे केश तथा लंबी दाढ़ी है। उनके हाथ में चारों वेद है तथा यहीं चारों वेद चार ऋषि के रूप में इस प्रतिमा पर उत्कीर्ण है साथ ही देानों बाजुओं में रूद्राक्ष की माला है तथा दूसरा हाथ रूद्राक्ष की माला लिए हुए आशीर्वाद देने की मुद्रा में है। बृहस्पति को नवग्रहों में से एक ग्रह और देवताओं के गुरू की संज्ञा प्राप्त है।

देवगुरू होने के कारण विद्वता, तेज, प्रतिभा एवं ज्ञान तथा सम्मान और व्यक्तित्व के लिए इन्हें परम प्रसिद्धि प्राप्त है। पुराणों व वेदों के अनुसार बृहस्पति समस्त देवी-देवताओं के परामर्शदाता गुरू है। इनके बारे में एक बात शास्त्रों में विख्यात है कि गुरू सत्य के प्रतीक है।

नवग्रहों के बीच बृहस्पति को ज्ञान एवं विद्वता को प्रतिनिधित्व प्राप्त है। वायु पुराण में बृहस्पति को महर्षि अंगिरा तथा माता सुनीता का पुत्र बताया है। महर्षि अंगिरा का पुत्र होने के कारण अंगिरा गोत्र संतान कहलाते है। इनकी बहन का नाम योग सिद्धा है। गुरू बृहस्पति जाति के ब्राह्मण है। ज्ञान क्षेत्र में इनकी तुना किसी से भी नहीं की जा सकती।

बृहस्पति का स्वभाव मौन एवं शांत है में इनके अग्नि और जल तत्व दोनों मौजूद है। देवगुरू बृहस्पति के अन्य नाम वाचस्पति सूरी, देव पुरोहित, गुरूमहाराज, सुराचार्य, देवेज्य, ईज्य, जीव और अंगिरा है। बृहस्पति का वाहन हाथी है तो समृद्धि का प्रतीक है। इन्हें उत्तर पूर्व कोण दिशा का स्वामी भी माना गया है।

गुरू बृहस्पति पीत वर्ण है इनको ऋग्वेद का स्वामी भी माना जाता है। पीत वर्ण होने के कारण बृहस्पति ग्रह अनिष्ट निवारण हेतु पीत दान का महत्व है, पीत दान की सामग्री में पीला वस्त्र, स्वर्ण, पीला फूल, हल्दी गांठ, गऊ घृत, पुखराज, पीला फल एवं अश्व दान का महत्व है। यह दान ब्राह्मण अथवा बृहस्पति को अर्पण करने का विधान है। इस मंदिर को गुरूमहाराज मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।

इस अतिप्राचीन मंदिर की प्राचीनता का अनुमान यहां लगे स्तम्भों को देखकर सहज ही लगाया जा सकता है जो परमार कालीन है। बृहस्पति मंदिर में लक्ष्मीनारायण, राधा-कृष्ण, हनुमानजी, नवग्रह, गणेशजी, भैरवजी, आदि की मनमोहक प्रतिमाएँ स्थापित थी जो आज भी मंदिर में विद्यमान है। जिसकी पूजा-अर्चना मंदिर के अधिष्ठता पुजारी स्व.श्री प्रेमनारायण जी पंण्डित के पूर्वजों द्वारा नियमित की जाती रही है।

प्राचीन समय में उज्जैन गढ़कालिका क्षेत्र में बसी हुई थी और सतीगेट क्षेत्र में घने जंगल हुआ करते थे उस समय इस क्षेत्र में तीन मंदिर थे जिसमें महाकालेश्वर, हरसिद्धि और गुरूमहाराज का मंदिर प्रमुख थे। इस क्षेत्र को महाकाल वन के नाम से जाना जाता था। गुरू मंदिर के आसपास राजा महाराज के परकोटे खींचे हुए थ। देवगुरू बृहस्पति की प्रतिमा पुजारी परिवार के पूर्वज को स्वप्न देकर निकली है जो आज भी यथा स्थान स्थापित है। यह प्रतिमा एक ही पाषाण पर उत्कीर्ण है तथा इसका स्वरूप वेद-पुराणों में उल्लेखित गुरू बृहस्पति के स्वरूपानुसार है। इस प्राचीन प्रतिमा का निर्माण एक दुर्लभ लाल पाषाण पर किसी समय किया गया था। इस मंदिर की खुदाई के समय बृहस्पति प्रतिमा के साथ गणेशजी, शीतला माता, भैरवजी, नवग्रह आदि प्रतिमा की खुदाई के समय इस स्थान पर प्राप्त हुई थी जो आज भी इस मंदिर में स्थापित है।

चूंकि उज्जैन नगरी काशी नगरी की ही तरह शिव भूमि है इसलिए यहां मंगलनाथ, शनिमहाराज आदि भी शिवलिंग के रूप में स्थापित है इसी प्रकार खुदाई के दौरान गुरू बृहस्पति का शिवलिंग भी प्राप्त हुआ जिनकी पूजन मंदिर में गुरू बृहस्पति के रूप में होती है। बृहस्पति ग्रह ज्योतिष शास्त्र के अनुसार एक सौम्य स्वभाव का सरल ओर मित्र ग्रह है। गुरू ग्रह का मनुष्य की जन्मकुण्डली में विशेष् महत्व रखने वाला ग्रह माना जाता है। विद्या, विवाह, राजनीति, व्यापार सहित सभी क्षेत्रों में बृहस्पति की स्थिति विशेष महत्व रखती है।

देवगुरू बृहस्पति मंदिर में हजारों ऐसे लड़के-लड़कियाँ जिनके विवाह आदि मंे परेशानी आ रही हो तो वह गुरू मंदिर में दर्शन, पूजा, अर्चना कर कार्य में आ रही बाधा को दूर करते हैं। इस मंदिर में दर्शन, पीतदान, अभिषेक पूजा करने से विवाह, विद्या, व्यापार आदि में आ रही समस्या का शीघ्र निवारण हो जाता है।

सिंह राशि में जब गुरू बृहस्पति का प्रवेश होता है तब सिंहस्थ का योग बनता है तथा इन्हीं बृहस्पति के कारण सिंहस्थ महाकुम्भ उज्जैन में होता है। गुरू बृहस्पति पांडाल के नाम से बडनगर क्षेत्र में मंदिर की ओर से कैम्प लगाया जाता है जिसमें अन्नक्षेत्र, महायज्ञ, प्रवचन, रामलीला, आदि का आयोजन बृहस्पति शोध संस्थान के तत्वावधान में किया जाता है। प्रतिवर्ष बृहस्पति शोध संस्थान के सदस्यों द्वारा वर्ष भर गुरू पूर्णिमा, वषर्ष प्रतिपदा, बृहस्पति समारोह के साथ-साथ प्रत्येक त्यौहारों पर मदिर में विशेष धार्मिक अनुष्ठान एवं कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहते हैं।

देवगुरू बृहस्पति मंदिर की पूजा-अर्चना वंश परम्परानुसार स्व.श्री वासुदेवजी किया करते थे जो ज्योतिष के प्रकाण्ड विद्वान थे तथा उनके बाद स्व.श्री प्रेमनारायणजी पण्डित ने इस परम्परा का निर्वाह किया, पूर्व में इस मंदिर की महत्ता से उज्जैनवासी परिचित नहीं थे लेकिन स्व.श्री प्रेमनारायणजी ने मंदिर की पूर्ण जानकारी विद्वानों एवं बृहस्पति शोध संस्थान के माध्यम से उज्जैन नगर में ही नही अपितु देश के कई हिस्सों तक फैलाई। स्व.श्री पण्डितजी ने समय-समय पर धर्मप्राण जनता को प्रेरित कर तथा अपने स्वयं के योगदान से मंदिर का जीर्णाेद्धार कराया तथा मंदिर को एक आकर्षक स्वरूप प्रदान करते हुए मंदिर में मार्बल कार्य, टाईल्स कार्य एवं शीशे का सुन्दर नक्काशीदार कार्य करवा कर लोगों के मन में धार्मिक आस्था की ज्योत जलाई। स्व.श्री पण्डितजी ने अथक प्रयासों से मंदिर में पार्वतीजी की प्रतिमा, तथा लक्ष्मीनारायण जी तथा नवग्रह की संगमरमर की भव्य एवं आकर्षक प्रतिमाओं की भी स्थापना करवाई। पण्डितजी ने मंदिर में अभिषे, आरती-पूजन, श्रंृगार, नैवेद्य ादि नियमित रूप से संचालित करने के साथ ही त्यौहारों पर मंदिर में विशेष श्रृंगार, विशेष आरती-पूजन, अन्नकूट, महाभोग, आदि की ज्ञी परम्परा कायम की जो आज भी मंदिर में नियमित रूप से संचालित की जाती है। जिसका लाभ हजारों नर-नारियाँ लेते हुए मनोरथ सिद्ध करते हैं। पण्डितजी के बाद अब उक्त कार्य पुजारी श्री आशीष पण्डित, आलोक पण्डित द्वारा संचालित किए जाते हैं।